Sharad Purnima 2026 हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला, चंद्रमा की पूजा, मां लक्ष्मी की आराधना और खीर बनाने की परंपरा के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणें विशेष महत्व रखती हैं। इसी कारण श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और रात में चंद्रमा के दर्शन करके सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
Sharad Purnima 2026 को लेकर भक्तों के मन में कई सवाल हैं—शरद पूर्णिमा कब है, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है, व्रत कैसे रखें, खीर किस समय बनाएं और पारण कब करें? इस लेख में इन सभी विषयों को सरल हिंदी में समझाया गया है, ताकि आप शरद पूर्णिमा का पर्व सही तिथि और धार्मिक परंपराओं के अनुसार मना सकें।
Note - इस ब्लॉग में दी गई जानकारी गौतीर्थ तुलसी तपोवन गौशाला के संस्थापक, पुराण मनीषी पूज्य श्री कौशिक जी महाराज जी के अनुसार प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग परंपराओं, पंचांगों और स्थान के अनुसार विधि एवं मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में Sharad Purnima का पर्व रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, चंद्रदेव और मां लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। श्रद्धालु शाम को चंद्रमा के दर्शन करते हैं और अपनी मान्यताओं के अनुसार खीर का भोग लगाते हैं। शरद पूर्णिमा की पूजा की तैयारी करने से पहले पूर्णिमा तिथि, चंद्रोदय और रात्रि पूजा का समय जान लेना चाहिए। नीचे दिए गए समय दिल्ली के पंचांग पर आधारित हैं; मथुरा और वृंदावन सहित अन्य स्थानों पर स्थानीय समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
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विवरण |
तिथि और समय |
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शरद पूर्णिमा 2026 की तारीख |
रविवार, 25 अक्टूबर 2026 |
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पूर्णिमा तिथि प्रारंभ |
25 अक्टूबर, सुबह 11:55 बजे |
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पूर्णिमा तिथि समाप्त |
26 अक्टूबर, सुबह 9:41 बजे |
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चंद्रोदय का समय |
25 अक्टूबर, शाम लगभग 5:00 बजे |
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निशीथ काल में लक्ष्मी पूजा |
रात 11:40 बजे से 26 अक्टूबर को रात 12:31 बजे तक |
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खीर रखने की परंपरा |
चंद्रमा निकलने के बाद, अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार |
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व्रत का पारण |
प्रचलित व्रत-विधि और स्थानीय पंचांग के अनुसार |
ध्यान दें: पूर्णिमा तिथि 26 अक्टूबर की सुबह समाप्त होने के बावजूद, शरद पूर्णिमा का मुख्य पर्व 25 अक्टूबर की शाम और रात को मनाया जाएगा। यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो पारण का समय अपनी व्रत परंपरा के अनुसार निर्धारित करें।
Sharad Purnima 2026 का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भक्ति, साधना, चंद्र उपासना और मां लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा हुआ है।
धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात चंद्रमा का प्रकाश अत्यंत सुंदर दिखाई देता है और इसे शीतलता, शांति तथा सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन बहुत से श्रद्धालु सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर भगवान का स्मरण करते हैं और शाम को पूजा-अर्चना करते हैं। कुछ परिवारों में रातभर भजन-कीर्तन और जागरण करने की परंपरा भी है।
शरद पूर्णिमा का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें संयम, श्रद्धा, परिवार के साथ समय बिताने और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की प्रेरणा भी देता है।
Sharad Purnima 2026 पर पूजा करने के लिए किसी कठिन विधि की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण, चंद्रदेव और मां लक्ष्मी की पूजा कर सकते हैं।
पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:
सुबह स्नान करें: प्रातः उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
व्रत का संकल्प लें: यदि आप व्रत रखना चाहते हैं, तो अपनी परंपरा के अनुसार भगवान के सामने संकल्प लें।
पूजा स्थल तैयार करें: घर के मंदिर को साफ करके भगवान श्रीकृष्ण और मां लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
दीपक जलाएं: पूजा स्थल पर दीपक जलाकर भगवान को पुष्प, फल, अक्षत और अपनी श्रद्धा के अनुसार नैवेद्य अर्पित करें।
मंत्र और कथा का पाठ करें: भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें और शरद पूर्णिमा की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
चंद्रमा के दर्शन करें: शाम को चंद्रमा निकलने पर उनकी पूजा करें। अर्घ्य देने की परंपरा हो तो स्वच्छ पात्र से जल अर्पित करें।
आरती करें: पूजा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण, चंद्रदेव और मां लक्ष्मी की आरती करें।
ध्यान रखें कि पूजा का कोई एक तरीका सभी क्षेत्रों में समान नहीं होता। कुछ परिवारों में मां लक्ष्मी की विशेष पूजा होती है, जबकि ब्रज क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण और उनकी महारास लीला का विशेष स्मरण किया जाता है।
Sharad Purnima 2026 की व्रत कथा के अलग-अलग क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। इनमें एक लोकप्रिय कथा दो बहनों से जुड़ी है, जिनमें एक धार्मिक नियमों का पालन करती थी, जबकि दूसरी व्रत के नियमों को पूरी श्रद्धा से नहीं निभाती थी।
लोकप्रिय कथा के अनुसार, दोनों बहनों के जीवन में उनके व्रत और आचरण के कारण अलग-अलग परिस्थितियां आती हैं। कथा में व्रत की पूर्णता, श्रद्धा और नियमों के पालन का महत्व समझाया जाता है। इसके माध्यम से भक्तों को यह संदेश मिलता है कि धार्मिक कार्य केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि सच्चे मन और विश्वास के साथ करने चाहिए।
हालांकि, इस कथा के विवरण विभिन्न धार्मिक पुस्तकों और क्षेत्रों में अलग-अलग मिल सकते हैं। इसलिए पूजा के समय अपने परिवार में प्रचलित शरद पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करना उचित है।
शरद पूर्णिमा व्रत कथा in Hindi पढ़ने या सुनने के बाद श्रद्धालु भगवान से परिवार की सुख-शांति और मंगल की प्रार्थना करते हैं।
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शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की पूजा करना इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में से एक है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में दिखाई देता है। धार्मिक मान्यताओं में चंद्रदेव को शीतलता, मन की शांति और सौम्यता से जोड़ा जाता है।
इस दिन चंद्रमा के दर्शन करके श्रद्धालु उन्हें प्रणाम करते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार अर्घ्य अर्पित करते हैं। कुछ लोग चंद्रदेव के मंत्रों का जाप करते हैं, जबकि कुछ भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेकर ध्यान और भजन करते हैं।
Sharad Purnima moonlight significance की बात करें तो हिंदू धार्मिक परंपरा में इस रात की चांदनी को विशेष पवित्रता से जोड़ा जाता है। चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा भी इसी विश्वास से जुड़ी है।
ध्यान रहे कि चंद्रमा की किरणों से खीर के औषधीय गुण बढ़ने या किसी बीमारी के ठीक होने के दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं मानना चाहिए। खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना धार्मिक आस्था का विषय है।
Sharad Purnima की रात को भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है। वर्षा ऋतु के बाद मौसम में बदलाव आता है और आकाश साफ होने पर पूर्ण चंद्रमा की सुंदरता मन को आकर्षित करती है।
धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत के समान गुण होते हैं। इसी कारण इसे अमृतमयी रात्रि भी कहा जाता है। श्रद्धालु इस अवसर पर भजन-कीर्तन करते हैं, भगवान का स्मरण करते हैं और चंद्रमा की रोशनी में कुछ समय बिताते हैं।
इस रात का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जोड़ा जाता है। ब्रज की वैष्णव परंपरा में शरद पूर्णिमा को राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और भक्ति के स्मरण का अवसर माना जाता है।
इस प्रकार शरद पूर्णिमा की रात धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक चिंतन का सुंदर संगम है।
शरद पूर्णिमा 2026 पर दूध और चावल से बनी खीर तैयार करना बहुत से हिंदू परिवारों में प्रचलित है। इसे भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर विशेष पवित्रता प्राप्त करती है। इसी कारण कई परिवार रात में खीर को ढककर खुले, सुरक्षित स्थान पर चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं।
खीर बनाने की सामान्य विधि इस प्रकार है:
सबसे पहले दूध को अच्छी तरह उबालें।
उसमें धुले हुए चावल डालकर धीमी आंच पर पकाएं।
स्वाद के अनुसार चीनी या मिश्री मिलाएं।
इलायची, बादाम और अन्य मेवे इच्छानुसार डालें।
खीर तैयार होने पर भगवान को भोग लगाएं।
शाम या रात में इसे साफ और सुरक्षित स्थान पर रखें।
शरद पूर्णिमा पर खीर क्यों बनाई जाती है? इसका मुख्य उत्तर धार्मिक आस्था और परंपरा में मिलता है। चांदनी में खीर रखने को शुभ माना जाता है, लेकिन इसके कारण खीर के स्वास्थ्य लाभ बढ़ने का दावा वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं है।
खीर को खुले में रखते समय धूल, कीड़े-मकोड़ों और पशुओं से बचाना जरूरी है। स्वच्छता का ध्यान रखें और खराब हो सकने वाले खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक असुरक्षित तापमान पर न रखें।
शरद पूर्णिमा 2026 को मां लक्ष्मी की आराधना के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेष रूप से महाराष्ट्र और पश्चिम भारत की कुछ परंपराओं में इस दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा की जाती है।
'कोजागरी' शब्द का संबंध लोकमान्यता में इस प्रश्न से जोड़ा जाता है—'कौन जाग रहा है?' मान्यता है कि इस रात जागरण करके मां लक्ष्मी का स्मरण करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा होती है।
मां लक्ष्मी की पूजा के लिए भक्त निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं:
पूजा स्थल और घर को साफ रखें।
मां लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं।
पुष्प, फल, मिठाई और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग अर्पित करें।
लक्ष्मी मंत्र, स्तोत्र या आरती का पाठ करें।
परिवार की सुख-समृद्धि और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें।
कुछ परंपराओं में लक्ष्मी पूजा रात के विशेष मुहूर्त में की जाती है। दिल्ली के लिए प्रकाशित पंचांगों में 25 अक्टूबर की रात लगभग 11:40 बजे से 26 अक्टूबर को 12:31 बजे तक निशीथ काल बताया गया है।
Sharad Purnima 2026 पर श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार कई धार्मिक कार्य कर सकते हैं। इनका उद्देश्य भगवान का स्मरण करना, मन को शांत रखना और दूसरों के प्रति सेवा भाव विकसित करना है।
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
भगवान श्रीकृष्ण, चंद्रदेव और मां लक्ष्मी का स्मरण करें।
शरद पूर्णिमा की कथा पढ़ें या सुनें।
शाम को चंद्रमा के दर्शन करें और अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करें।
घर में भजन-कीर्तन या धार्मिक पाठ का आयोजन करें।
जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी वस्तुएं दान करें।
परिवार के साथ प्रसाद बांटें और सद्भाव बनाए रखें।
ब्रज क्षेत्र में रहने वाले या यहां आने वाले श्रद्धालु इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण कर सकते हैं। वृंदावन और मथुरा के मंदिरों में दर्शन करने की योजना हो तो यात्रा से पहले मंदिर के दर्शन समय और विशेष आयोजन की जानकारी अवश्य प्राप्त करें।
शरद पूर्णिमा के दिन धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ व्यावहारिक सावधानियां रखना भी जरूरी है।
इन बातों का ध्यान रखें:
व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखें।
पूजा के लिए स्वच्छ स्थान और साफ सामग्री का इस्तेमाल करें।
चंद्रमा के दर्शन के लिए सुरक्षित स्थान चुनें।
खीर को खुले में रखते समय उसे ढककर रखें और स्वच्छता का ध्यान दें।
मंदिर में दर्शन करने जाते समय वहां के नियमों का पालन करें।
भीड़भाड़ वाले स्थानों पर बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।
पूजा के मुहूर्त के लिए अपने शहर के पंचांग को प्राथमिकता दें।
धार्मिक मान्यताओं में इस दिन अपशब्द बोलने, दूसरों को दुख पहुंचाने, अनावश्यक विवाद करने और जरूरतमंद लोगों की उपेक्षा करने से बचने की प्रेरणा दी जाती है।
यदि आप व्रत रख रहे हैं, तो अपने परिवार की परंपरा के अनुसार खानपान के नियमों का पालन करें। किसी धार्मिक नियम को लेकर अनावश्यक भय न रखें। अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में प्रचलित नियमों में अंतर हो सकता है।
हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को दान-पुण्य और सेवा के लिए शुभ माना जाता है। शरद पूर्णिमा पर भी श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान कर सकते हैं।
इस दिन निम्नलिखित वस्तुओं का दान करना प्रचलित है:
जरूरतमंद लोगों को भोजन या अन्न।
गरीब परिवारों को वस्त्र और दैनिक उपयोग की सामग्री।
बुजुर्गों, असहाय लोगों और जरूरतमंद बच्चों की सहायता।
गौसेवा के लिए हरा चारा, पशुओं का आहार या अन्य जरूरी सामग्री।
धार्मिक और सामाजिक सेवा कार्यों में अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग।
दान का महत्व केवल वस्तु या धन की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना से जुड़ा है। किसी जरूरतमंद की सहायता करना, भूखे को भोजन देना और पशुओं की देखभाल करना भी सेवा के महत्वपूर्ण रूप हैं।
गौसेवा में रुचि रखने वाले श्रद्धालु गौतीर्थ तुलसी तपोवन गौशाला जैसे सेवा कार्यों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अपनी इच्छा एवं सामर्थ्य के अनुसार सहयोग कर सकते हैं।
कोजागरी पूर्णिमा शरद पूर्णिमा 2026 का ही एक प्रचलित नाम है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां इस अवसर पर मां लक्ष्मी की रात्रि पूजा और जागरण की परंपरा है।
लोकमान्यता के अनुसार, इस रात मां लक्ष्मी अपने भक्तों की परीक्षा लेने और उन पर कृपा करने के लिए विचरण करती हैं। इसी विश्वास से श्रद्धालु रात में जागकर पूजा-पाठ करते हैं।
हालांकि, कोजागरी पूजा की विधि सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं होती। कहीं मां लक्ष्मी की विशेष आराधना होती है, तो कहीं चंद्रमा की पूजा और खीर का भोग प्रमुख होता है।
Kojagari Purnima 2026 भी 25 अक्टूबर की शरद पूर्णिमा की रात से संबंधित है। पूजा के सटीक समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग को देखें।
ब्रज की धार्मिक परंपरा में शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित रास प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों की दिव्य लीला का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वैष्णव परंपरा में रासलीला को केवल नृत्य या उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और भक्ति के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है।
वृंदावन, बरसाना और ब्रज के अन्य धार्मिक स्थलों में इस पर्व के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का विशेष स्मरण किया जाता है। मंदिरों में आयोजन की प्रकृति और समय अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए दर्शन के लिए निकलने से पहले स्थानीय जानकारी प्राप्त करना उपयोगी रहेगा।
शरद पूर्णिमा का यह पक्ष ब्रजवासियों और कृष्ण भक्तों के लिए विशेष भावनात्मक महत्व रखता है।
हिंदू चंद्र पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को Sharad Purnima कहा जाता है। इसी वजह से इसे अश्विन पूर्णिमा या आश्विन पूर्णिमा व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
पूर्णिमा तिथि चंद्रमा की स्थिति पर आधारित होती है। इसलिए इसकी शुरुआत और समाप्ति अंग्रेजी कैलेंडर की मध्यरात्रि से निर्धारित नहीं होती। तिथि एक दिन में शुरू होकर अगले दिन सुबह तक रह सकती है।
वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को लगभग सुबह 11:55 बजे शुरू होकर 26 अक्टूबर को लगभग सुबह 9:41 बजे समाप्त होगी।
शरद पूर्णिमा के साथ कई पौराणिक और लोकमान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इनमें चंद्रमा की सोलह कलाओं, अमृतमयी चांदनी, मां लक्ष्मी की कृपा और भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला का विशेष उल्लेख मिलता है।
धार्मिक विश्वास के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में विशेष दिव्यता होती है। इसी मान्यता के कारण लोग खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं और बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
कुछ परंपराओं में इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना से घर में सुख-समृद्धि आने की कामना की जाती है। वहीं, कृष्ण भक्त इस रात को राधा-कृष्ण की दिव्य लीला का स्मरण करने का अवसर मानते हैं।
इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए। अलग-अलग पुराणों, क्षेत्रीय कथाओं और संप्रदायों में इनके विवरण भिन्न हो सकते हैं।

शरद पूर्णिमा 2026 का व्रत श्रद्धा और संकल्प के साथ रखा जाता है। कुछ श्रद्धालु पूरे दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ फलाहार या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं।
व्रत रखने से पहले इन बातों को समझ लें:
सुबह स्नान के बाद भगवान का स्मरण करके व्रत का संकल्प लें।
अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार, जल या अन्य अनुमत आहार ग्रहण करें।
दिनभर संयम रखें और पूजा-पाठ के लिए समय निकालें।
शाम को चंद्रमा के दर्शन करके पूजा करें।
व्रत कथा पढ़ें या सुनें और आरती करें।
अगले दिन व्रत का पारण अपनी परंपरा के अनुसार करें।
ध्यान दें कि शरद पूर्णिमा के व्रत के नियम हर परिवार और क्षेत्र में समान नहीं होते। यदि आपको कोई बीमारी है, नियमित दवाएं लेते हैं या लंबे समय तक भूखे रहने में परेशानी होती है, तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और चिकित्सकीय सलाह के बिना कठिन उपवास न करें।
यदि आप पहली बार Sharad Purnima 2026 का व्रत रख रहे हैं, तो इसे सरल तरीके से कर सकते हैं।
सुबह: स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण और मां लक्ष्मी का स्मरण करें। अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत का संकल्प लें।
दिन में: धार्मिक पाठ करें, भजन सुनें और अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या उपवास जारी रखें।
शाम को: पूजा स्थल पर दीपक जलाएं। भगवान को पुष्प, फल और खीर का भोग अर्पित करने की तैयारी करें।
रात में: चंद्रमा निकलने पर दर्शन करें। अपनी परंपरा के अनुसार चंद्रदेव को अर्घ्य दें, व्रत कथा पढ़ें और आरती करें।
अगली सुबह: व्रत की परंपरा के अनुसार पारण करें। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अन्य वस्तु दान करना चाहें तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हैं।
व्रत का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भगवान के प्रति भक्ति रखना है। इसलिए कठिन नियमों का पालन करने के बजाय अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुरूप व्रत रखें।
शरद पूर्णिमा के व्रत का पारण कब करना चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस परंपरा के अनुसार व्रत रख रहे हैं। कुछ श्रद्धालु चंद्रमा की पूजा के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ लोग अगले दिन सुबह पारण करते हैं।
वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 26 अक्टूबर की सुबह लगभग 9:41 बजे समाप्त होगी।
पारण करते समय इन बातों का ध्यान रखें:
अपने व्रत की परंपरा के अनुसार उचित समय तय करें।
भगवान का स्मरण करके व्रत खोलें।
हल्का और सुपाच्य भोजन ग्रहण करें।
यदि आपने फलाहार किया है, तो सामान्य भोजन धीरे-धीरे शुरू करें।
स्वास्थ्य के विपरीत लंबे समय तक उपवास न बढ़ाएं।
यदि आपके परिवार में विशेष पारण विधि प्रचलित है, तो उसका पालन करें। संदेह होने पर स्थानीय पंडित या पंचांग से पुष्टि कर लें।
शरद पूर्णिमा की तैयारी एक-दो दिन पहले करने से पूजा के समय अनावश्यक परेशानी नहीं होती। घर में पूजा का स्थान साफ करें और आवश्यक सामग्री पहले से रख लें।
पूजा के लिए सामान्यतः इन वस्तुओं की जरूरत हो सकती है:
भगवान श्रीकृष्ण और मां लक्ष्मी की तस्वीर या प्रतिमा।
दीपक, घी या तेल, रुई की बत्ती और माचिस।
पुष्प, अक्षत, रोली और चंदन।
फल, मिठाई और खीर बनाने की सामग्री।
चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए स्वच्छ पात्र और जल।
आरती की पुस्तक या व्रत कथा।
यह सूची सामान्य मार्गदर्शन के लिए है। आपकी पारिवारिक या क्षेत्रीय परंपरा में कुछ अलग सामग्री भी शामिल हो सकती है।
यदि आप वृंदावन या मथुरा में दर्शन करने जा रहे हैं, तो यात्रा, यातायात और मंदिर के दर्शन समय की जानकारी पहले प्राप्त कर लें। विशेष पर्वों पर भीड़ अधिक हो सकती है।
शरद पूर्णिमा पर चंद्र दर्शन के लिए चंद्रोदय का समय जानना उपयोगी है। चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए दिल्ली का समय मथुरा या वृंदावन पर बिल्कुल समान रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए।
सही समय जानने के लिए:
अपने शहर का नाम चुनकर किसी विश्वसनीय पंचांग में शरद पूर्णिमा की जानकारी देखें।
चंद्रोदय और पूर्णिमा तिथि के समय को अलग-अलग समझें।
यदि चंद्रमा बादलों से ढका हो, तो पूजा की परंपरा के संबंध में स्थानीय धार्मिक मार्गदर्शन लें।
मंदिर में चंद्र दर्शन या विशेष पूजा का आयोजन हो तो उसका समय अलग से जांचें।
25 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के लिए प्रकाशित पंचांग में चंद्रोदय का समय लगभग शाम 5 बजे बताया गया है।
ब्रज भूमि का भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और लीलाओं से गहरा संबंध है। मथुरा, वृंदावन, बरसाना और गोवर्धन जैसे धार्मिक स्थलों पर कृष्ण भक्ति की अनेक परंपराएं प्रचलित हैं। इसी वजह से शरद पूर्णिमा का पर्व ब्रज क्षेत्र में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है।
शरद पूर्णिमा पर श्रद्धालु राधा-कृष्ण का स्मरण करते हैं और रासलीला से जुड़ी धार्मिक कथाओं का पाठ करते हैं। वृंदावन के मंदिरों में विशेष श्रृंगार, भजन-कीर्तन या अन्य धार्मिक आयोजन हो सकते हैं। हालांकि, सभी मंदिरों का कार्यक्रम और दर्शन समय एक जैसा नहीं होता।
यदि आप 25 अक्टूबर 2026 को वृंदावन या मथुरा जाने की योजना बना रहे हैं, तो यात्रा से पहले मंदिरों की वर्तमान जानकारी अवश्य प्राप्त करें। विशेष पर्व पर भीड़ और यातायात में बदलाव संभव है।
ब्रज की इस पावन परंपरा में शरद पूर्णिमा हमें भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, प्रेम और समर्पण का स्मरण कराती है।
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Ans. शरद पूर्णिमा 2026 रविवार, 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन शाम और रात में चंद्र दर्शन तथा पूजा की परंपरा है।
Ans. पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह लगभग 11:55 बजे शुरू होकर 26 अक्टूबर को सुबह लगभग 9:41 बजे समाप्त होगी। ये समय दिल्ली के पंचांग के अनुसार है
Ans. पूजा का शुभ समय पूजा की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार तय होता है। दिल्ली के लिए निशीथ काल लगभग 25 अक्टूबर की रात 11:40 बजे से 26 अक्टूबर को 12:31 बजे तक बताया गया है
Ans. खीर शाम या रात में पूजा के लिए तैयार की जा सकती है। कई परिवार इसे चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं और भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
Ans. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणें विशेष महत्व रखती हैं। चांदनी में खीर रखने की परंपरा इसी विश्वास से जुड़ी है।
Ans. सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें, अपनी परंपरा के अनुसार उपवास या फलाहार करें, शाम को पूजा करें और चंद्रमा के दर्शन के बाद निर्धारित विधि का पालन करें।
Ans. पारण का समय व्रत की परंपरा पर निर्भर करता है। कुछ लोग रात में पूजा के बाद व्रत खोलते हैं और कुछ अगले दिन सुबह पारण करते हैं। अपने स्थानीय पंचांग और पारिवारिक परंपरा का पालन करें।
Ans. हां, सामान्यतः कोजागरी पूर्णिमा शरद पूर्णिमा का ही एक नाम है। कुछ क्षेत्रों में इस दिन मां लक्ष्मी की विशेष रात्रि पूजा और जागरण किया जाता है।
Ans. ब्रज की वैष्णव परंपरा में शरद पूर्णिमा को भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला के स्मरण से जोड़ा जाता है। इसी कारण इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
Ans. आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, भोजन, वस्त्र या जरूरतमंद लोगों के लिए उपयोगी सामग्री दान कर सकते हैं। गौसेवा और अन्य सेवा कार्यों में सहयोग करना भी एक विकल्प है।
Ans. चंद्रमा की पूजा इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में से एक है। पूजा का तरीका परिवार और क्षेत्र की मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकता है।
Ans. कुछ परंपराओं में कोजागरी पूजा के अवसर पर रात्रि जागरण किया जाता है, लेकिन इसे हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय लें।
Sharad Purnima 2026 का पर्व 25 अक्टूबर, रविवार को मनाया जाएगा। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, चंद्रमा की पूजा, मां लक्ष्मी की आराधना और खीर बनाने की परंपरा से जुड़ा है। इस दिन श्रद्धालु पूजा-पाठ, व्रत, दान और सेवा के माध्यम से आध्यात्मिक शांति तथा परिवार के मंगल की कामना करते हैं।
ब्रज और वृंदावन के श्रद्धालुओं के लिए यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला का स्मरण करने का विशेष अवसर है। पूजा के समय और व्रत के नियमों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।
इस ब्लॉग में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं और उपलब्ध पंचांग विवरणों पर आधारित है। पूजा विधि, व्रत के नियम, शुभ मुहूर्त और पारण के समय में अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों तथा पंचांगों के अनुसार अंतर हो सकता है। सटीक स्थानीय समय के लिए अपने क्षेत्र के विश्वसनीय पंचांग या विद्वान से पुष्टि करें। धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य संबंधी तथ्यों से अलग समझें।
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