Pitru Paksha 2026 यानी पितृ पक्ष 2026 हिंदू धर्म में पूर्वजों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य का विशेष समय माना जाता है। साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत रविवार, 27 सितंबर 2026 से होगी और इसका समापन शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इससे पहले 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध किया जाएगा।
इस दौरान परिवार के जिन पूर्वजों की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, सामान्यतः उसी तिथि के अनुसार पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा बताई जाती है।
इस लेख में पितृ पक्ष 2026 कब से शुरू होगा, श्राद्ध की तारीखें, श्राद्ध विधि, तर्पण, पिंडदान, कुतुप काल, अपराह्न काल, भोजन-दान के नियम और पितृ पक्ष में क्या करें और क्या न करें जैसी महत्वपूर्ण जानकारी सरल भाषा में दी गई है।
महत्वपूर्ण: इस ब्लॉग में दी गई धार्मिक जानकारी गौतीर्थ तुलसी तपोवन गौशाला के संस्थापक, पुराण मनीषी पूज्य श्री कौशिक जी महाराज जी के अनुसार प्रस्तुत की गई है। अलग-अलग परंपराओं, पंचांगों और स्थान के अनुसार विधि एवं मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।
पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर 2026, रविवार से होगी और 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। 26 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा का पूर्णिमा श्राद्ध रहेगा।
उत्तर भारतीय पंचांग परंपरा में इसे आश्विन कृष्ण पक्ष के रूप में देखा जाता है, जबकि अमांत परंपरा में मास के नाम में अंतर दिखाई दे सकता है। श्राद्ध करने की तिथियां व्यवहार में समान क्रम में आती हैं।
2026 की मुख्य तारीखें:
कुछ स्थानों पर तिथि के क्षय/वृद्धि या तिथि के सूर्योदय पर रहने के कारण एक ही दिन दो श्राद्ध तिथियां आ सकती हैं। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से अंतिम पुष्टि करना उचित है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध मुख्य रूप से मृत व्यक्ति की मृत्यु तिथि यानी हिंदू चंद्र तिथि के आधार पर किया जाता है।
| श्राद्ध तिथि | 2026 में तारीख | दिन |
|---|---|---|
| पूर्णिमा श्राद्ध | 26 सितंबर | शनिवार |
| प्रतिपदा | 27 सितंबर | रविवार |
| द्वितीया | 28 सितंबर | सोमवार |
| तृतीया | 29 सितंबर | मंगलवार |
| चतुर्थी | 30 सितंबर | बुधवार |
| पंचमी | 30 सितंबर | बुधवार |
| षष्ठी | 1 अक्टूबर | गुरुवार |
| सप्तमी | 2 अक्टूबर | शुक्रवार |
| अष्टमी | 3 अक्टूबर | शनिवार |
| नवमी | 4 अक्टूबर | रविवार |
| दशमी | 5 अक्टूबर | सोमवार |
| एकादशी | 6 अक्टूबर | मंगलवार |
| द्वादशी | 7 अक्टूबर | बुधवार |
| त्रयोदशी | 8 अक्टूबर | गुरुवार |
| चतुर्दशी | 9 अक्टूबर | शुक्रवार |
| सर्वपितृ अमावस्या | 10 अक्टूबर | शनिवार |
2026 में पंचमी श्राद्ध 30 सितंबर को आने और अन्य तिथियों के क्रम की पुष्टि पंचांग स्रोतों में भी होती है।
श्राद्ध की तिथि मृतक की मृत्यु के समय की चंद्र तिथि के अनुसार निर्धारित की जाती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष में सप्तमी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है।
सरल रूप से समझें:
श्राद्ध की तिथि केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर तय नहीं करनी चाहिए, क्योंकि हिंदू तिथि सूर्योदय और चंद्र गणना पर आधारित होती है।
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पितृ पक्ष 2026 का पहला नियमित श्राद्ध 27 सितंबर 2026, रविवार को प्रतिपदा तिथि पर होगा।
पंचांग गणना के अनुसार प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर की रात से शुरू होकर 27 सितंबर तक रहती है। उदाहरण के लिए उपलब्ध भारतीय पंचांग गणना में प्रतिपदा श्राद्ध का कुतुप मुहूर्त लगभग दोपहर के आसपास और अपराह्न काल उसके बाद बताया गया है। स्थान के अनुसार समय बदल सकता है।
26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध भी रहेगा, इसलिए पूर्णिमा तिथि में दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने वाले लोग उस दिन विधि कर सकते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या 2026 शनिवार, 10 अक्टूबर को है। इसे महालय अमावस्या, पितृ अमावस्या या सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।
यह दिन विशेष रूप से उन पूर्वजों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो, या जिनका नियमित तिथि श्राद्ध किसी कारण से नहीं किया जा सका हो।
10 अक्टूबर को अमावस्या तिथि रात तक रहने की पंचांग गणना उपलब्ध है। उदाहरण के लिए कोटा गणना में अमावस्या 9 अक्टूबर रात से 10 अक्टूबर रात तक बताई गई है और श्राद्ध के लिए कुतुप व अपराह्न काल दोपहर में रहता है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध के लिए सामान्यतः अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। श्राद्ध कर्म में कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और उसके बाद का अपराह्न काल महत्वपूर्ण समय माने जाते हैं।
आमतौर पर यह समय लगभग दोपहर 11:30 बजे से 3:30 बजे के बीच आता है, लेकिन सही समय शहर और उस दिन के सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार बदलता है।
उदाहरण के लिए 27 सितंबर की एक भारतीय पंचांग गणना में कुतुप मुहूर्त लगभग 11:58 AM से 12:46 PM और अपराह्न काल लगभग 1:34 PM से 3:58 PM बताया गया है।
इसलिए श्राद्ध का सही मुहूर्त स्थानीय पंचांग के अनुसार ही तय करें।
कुतुप काल श्राद्ध कर्म के लिए विशेष रूप से उल्लेखित समयखंड है। इसके बाद रौहिण काल और अपराह्न काल भी श्राद्ध कर्म के लिए उपयोगी माने जाते हैं।
उदाहरण के लिए 29 सितंबर 2026 को तृतीया श्राद्ध के लिए एक भारतीय पंचांग गणना में:
बताया गया है।
इसी प्रकार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के लिए एक गणना में कुतुप काल लगभग 11:50 AM से 12:37 PM और अपराह्न काल लगभग 1:24 PM से 3:44 PM बताया गया है।
नोट: ये समय उदाहरण के लिए हैं। आपके शहर में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
पितृ पक्ष में श्राद्ध की विधि परंपरा और परिवार की धार्मिक मान्यता के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य रूप से श्राद्ध में निम्न चरण शामिल माने जाते हैं:
श्राद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता का माना जाता है।
श्राद्ध सामग्री परिवार की परंपरा और स्थानीय विधि के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्यतः इनमें ये चीजें रखी जाती हैं:
यदि किसी विशेष संप्रदाय या पुरोहित की विधि से श्राद्ध कर रहे हैं तो उसी के अनुसार सामग्री की सूची पहले से तैयार करना बेहतर है।
पितृ तर्पण में जल के साथ तिल आदि अर्पित करके पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। तर्पण की पूरी विधि परंपरा, गोत्र, संकल्प और पुरोहितीय पद्धति के अनुसार बदल सकती है।
सामान्य रूप से व्यक्ति स्नान करके स्वच्छ स्थान पर बैठता है और पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करता है।
तर्पण करते समय जल्दबाजी के बजाय शांत मन और श्रद्धा रखना महत्वपूर्ण है। यदि आपको सही दिशा, आसन, कुश और मंत्र की जानकारी नहीं है तो किसी जानकार आचार्य या पुरोहित से विधि सीखना बेहतर रहेगा।
पिंडदान श्राद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। इसमें पिंड के माध्यम से दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण व्यक्त किया जाता है।
पिंडदान घर पर पारंपरिक विधि से भी किया जा सकता है, जबकि गया जी जैसे तीर्थस्थलों पर पिंडदान की विशेष धार्मिक परंपरा है।
पिंडदान की विधि में परिवार की परंपरा और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए तीर्थ पर पिंडदान करते समय वहां के आचार्य या पुरोहित के निर्देश का पालन करना उचित है।
पितृ पक्ष में धार्मिक परंपराओं के अनुसार निम्न कार्य किए जा सकते हैं:
पितृ पक्ष को केवल एक कर्मकांड के रूप में न देखकर पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सेवा की भावना से जोड़कर देखना भी सार्थक माना जा सकता है।
पारंपरिक मान्यताओं में पितृ पक्ष के दौरान संयमित जीवन और सात्त्विक आचरण पर जोर दिया जाता है।
इस दौरान लोग सामान्यतः:
कुछ परिवारों में शुभ कार्यों को लेकर अलग-अलग परंपराएं होती हैं, इसलिए स्थानीय धार्मिक परंपरा का पालन करना उचित है।
पितृ पक्ष को मुख्य रूप से श्राद्ध, तर्पण, पूर्वज स्मरण और दान-पुण्य का समय माना जाता है। इसलिए कई परिवार इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्यक्रमों को टालते हैं।
हालांकि दैनिक जीवन के आवश्यक कार्यों पर इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरी तरह रोक लग जाती है। किसी विशेष शुभ कार्य की स्थिति में परिवार की परंपरा और विद्वान आचार्य की सलाह के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है।
श्राद्ध में भोजन को सात्त्विक रखने की परंपरा है। परिवार की मान्यता के अनुसार भोजन में चावल, दाल, सब्जियां, खीर, फल आदि रखे जा सकते हैं।
श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोजन, जरूरतमंद को भोजन अथवा अन्नदान की परंपरा भी कई परिवारों में होती है।
दान में अपनी क्षमता के अनुसार:
दी जा सकती हैं।
दान का उद्देश्य केवल राशि खर्च करना नहीं बल्कि श्रद्धा और सेवा की भावना रखना है।

पितृ पक्ष में कौआ, गाय और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा कई परिवारों में देखने को मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से इन जीवों को भोजन अर्पित करना पूर्वजों के स्मरण और जीव सेवा से जोड़ा जाता है। इसका एक व्यापक संदेश यह भी है कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं बल्कि अन्य जीवों के प्रति भी करुणा रखे।
इसलिए पितृ पक्ष में गौसेवा, जीव सेवा और अन्नदान को श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।
श्राद्ध परंपरा में ब्राह्मण भोजन और दान का विशेष स्थान बताया जाता है। इसका उद्देश्य श्रद्धापूर्वक भोजन एवं दक्षिणा अर्पित करना और पूर्वजों का स्मरण करना है।
आज के समय में व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन, अन्न या उपयोगी वस्तुएं देकर भी सेवा कर सकता है।
यहां दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा, विनम्रता और सेवा भावना है।
यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, तो परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने का विकल्प बताया जाता है।
2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को होगी। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है।
इसी कारण इसे उन पूर्वजों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका नियमित श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया।
अकाल या असामान्य परिस्थितियों में हुई मृत्यु के लिए श्राद्ध की विशेष तिथि और विधि को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं मिलती हैं।
सामान्य तिथि श्राद्ध से इसे अलग माना जा सकता है। इसलिए ऐसी स्थिति में केवल इंटरनेट की सामान्य जानकारी के आधार पर तिथि तय करने के बजाय परिवार की परंपरा जानने वाले पुरोहित या आचार्य से परामर्श करना उचित है।
विशेष परिस्थितियों में चतुर्दशी से संबंधित श्राद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है, जबकि अन्य परंपराओं में अलग विधि भी अपनाई जाती है।
पितृ पक्ष लगभग पूरे पक्ष यानी कई चंद्र तिथियों की अवधि है, जिसमें अलग-अलग मृत्यु तिथियों के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
वहीं सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष की अंतिम अमावस्या तिथि है। 2026 में यह 10 अक्टूबर को है।
सरल भाषा में:
पितृ पक्ष = पूरे श्राद्ध पक्ष की अवधि
सर्वपितृ अमावस्या = पितृ पक्ष का अंतिम दिन
सर्वपितृ अमावस्या उन पूर्वजों के लिए विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं है।
गया जी पितृ श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थलों में माना जाता है। यहां पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण की विशेष परंपरा है।
यदि पितृ पक्ष 2026 में गया जी में पिंडदान करने की योजना है तो यात्रा से पहले वहां की स्थानीय व्यवस्था, पुरोहित, विधि और समय की जानकारी लेना उचित रहेगा।
मथुरा श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने के साथ-साथ ब्रज क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक स्थान है। यहां पितृ स्मरण और धार्मिक अनुष्ठान अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार किए जाते हैं।
वृंदावन में भी धार्मिक अनुष्ठान और सेवा कार्यों की परंपरा है। पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालु तर्पण, दान, गौसेवा और धार्मिक सेवा में भाग ले सकते हैं।
यदि आप किसी तीर्थ पर पिंडदान या श्राद्ध कराने जा रहे हैं, तो स्थानीय आचार्य से तिथि, संकल्प, विधि और मुहूर्त की पुष्टि जरूर करें।
अगर आपको घर पर पितृ श्राद्ध की तैयारी करनी है तो इसे इस क्रम में समझ सकते हैं:
सुबह: स्नान और घर की स्वच्छता
पूर्वाह्न: श्राद्ध सामग्री और भोजन की तैयारी
दोपहर: निर्धारित कुतुप/रौहिण/अपराह्न काल में श्राद्ध कर्म
इसके बाद: तर्पण, भोजन एवं दान की परंपरा
अंत में: पितरों का स्मरण और प्रार्थना
श्राद्ध की वास्तविक विधि परिवार की परंपरा और आचार्य द्वारा बताई गई पद्धति के अनुसार करें।
पितृ पक्ष केवल पूर्वजों का स्मरण करने का अवसर ही नहीं बल्कि दान, गौसेवा, अन्नदान और जीव सेवा जैसे कार्यों से जुड़ने का भी समय माना जाता है।
अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद को भोजन कराना, गौशाला में चारा देना, पक्षियों के लिए दाना रखना या किसी सेवा कार्य में सहयोग करना श्रद्धा और करुणा की भावना को मजबूत कर सकता है।
गौतीर्थ तुलसी तपोवन गौशाला जैसे सेवा प्रकल्पों के माध्यम से गौसेवा में सहयोग करना भी सेवा भावना का एक माध्यम हो सकता है।
Ans. पितृ पक्ष 2026 का पहला नियमित श्राद्ध 27 सितंबर 2026, रविवार को प्रतिपदा तिथि पर होगा। इससे पहले 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है।
Ans. इस विषय में अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में अलग नियम मिलते हैं। कई परंपराओं में महिलाएं तर्पण और पितृ स्मरण से जुड़े धार्मिक कार्य करती हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और आचार्य की सलाह के अनुसार विधि अपनाना उचित है।
Ans. पितरों के लिए स्थान निर्धारित करने की परंपरा परिवार और वास्तु मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकती है। यदि घर में तस्वीर या स्मृति स्थान बनाया गया है तो उसे स्वच्छ, शांत और सम्मानजनक स्थान पर रखना चाहिए।
Ans. पितृ तर्पण में सामान्यतः जल और तिल का प्रयोग किया जाता है। कुश आदि की आवश्यकता भी परंपरा के अनुसार हो सकती है। सही विधि के लिए अपने आचार्य या पुरोहित से पूछना बेहतर है।
Ans. पारंपरिक मान्यताओं में इस अवधि में असंयमित जीवन, नशा, अनावश्यक विवाद और अत्यधिक तामसिक आचरण से बचने की सलाह दी जाती है। परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं।
Ans. पितरों की फोटो लगाने को लेकर परिवार और वास्तु परंपराओं में अलग-अलग मान्यताएं हैं। यदि फोटो रखी जाती है तो उसे सम्मानजनक, साफ और व्यवस्थित स्थान पर रखना चाहिए।
Ans. यदि परिवार में पितरों के निमित्त दीपक जलाने की परंपरा है तो स्वच्छ स्थान पर श्रद्धा के साथ दीपक जलाया जा सकता है। दीपक की दिशा, तेल/घी और स्थान को लेकर स्थानीय परंपरा अलग हो सकती है।
Ans. धार्मिक दृष्टि से पितरों के प्रति सम्मान, श्राद्ध-तर्पण, दान, अन्नदान, गौसेवा, जीव सेवा और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे केवल किसी एक दिन के कर्मकांड के बजाय कृतज्ञता की भावना के रूप में देखना उपयोगी है।
Ans. सूर्य देव को जल अर्पित करना अलग धार्मिक परंपरा के रूप में किया जाता है। पितृ पक्ष होने के कारण इसे रोकना आवश्यक नहीं माना जाता। व्यक्ति अपनी नियमित पूजा परंपरा के अनुसार सूर्य को अर्घ्य दे सकता है।
Ans. तुलसी पूजा भी कई परिवारों की दैनिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। पितृ पक्ष के कारण नियमित तुलसी पूजा बंद करने का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार तुलसी सेवा कर सकते हैं।
Ans. धार्मिक मान्यताओं में पितरों को सम्मान और स्मरण से जोड़ा जाता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पितरों का कोई निश्चित भौतिक स्थान घर के किसी एक कमरे में ही होता है। इसलिए घर में स्वच्छता, श्रद्धा और पूर्वजों के प्रति सम्मान बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है।
26 सितंबर 2026, शनिवार — पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर 2026, रविवार — प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर 2026, सोमवार — द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर 2026, मंगलवार — तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर 2026, बुधवार — चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध
1 अक्टूबर 2026, गुरुवार — षष्ठी श्राद्ध
2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार — सप्तमी श्राद्ध
3 अक्टूबर 2026, शनिवार — अष्टमी श्राद्ध
4 अक्टूबर 2026, रविवार — नवमी श्राद्ध
5 अक्टूबर 2026, सोमवार — दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर 2026, मंगलवार — एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर 2026, बुधवार — द्वादशी श्राद्ध
8 अक्टूबर 2026, गुरुवार — त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर 2026, शुक्रवार — चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर 2026, शनिवार — सर्वपितृ अमावस्या
पंचांग गणनाओं में स्थान के अनुसार कुछ तिथियों के समय में अंतर हो सकता है, इसलिए अंतिम श्राद्ध मुहूर्त अपने स्थानीय शहर के पंचांग से जांचना चाहिए।
Pitru Paksha 2026 पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और श्रद्धा के साथ श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, अन्नदान तथा सेवा करने का अवसर है। 2026 में पितृ पक्ष का मुख्य क्रम 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।
यदि पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात है तो संबंधित तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है तो सर्वपितृ अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस दौरान धार्मिक कर्मकांड के साथ गौसेवा, अन्नदान, जीव सेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे सेवा कार्य भी श्रद्धा और करुणा की भावना से किए जा सकते हैं।
यह जानकारी गौतीर्थ तुलसी तपोवन गौशाला के संस्थापक, पुराण मनीषी पूज्य श्री कौशिक जी महाराज जी के अनुसार प्रस्तुत की गई है।
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और उपलब्ध पंचांग गणनाओं के आधार पर प्रस्तुत की गई है। श्राद्ध की तिथि, तर्पण विधि, पिंडदान की प्रक्रिया और मुहूर्त में स्थान, पंचांग तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। विशेष रूप से श्राद्ध एवं पिंडदान से जुड़े कर्मकांड करने से पहले अपने स्थानीय पंचांग और योग्य आचार्य/पुरोहित से पुष्टि करें। यह लेख किसी धार्मिक कर्मकांड के लिए व्यक्तिगत या अनिवार्य निर्देश के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
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